Tuesday, January 28, 2020

नए ज़माने के डेटिंग एप्स आपके रिश्तों पर कैसे डाल रहे हैं असर

गए वो ज़माने जब ये सब करने में महीनों-सालों लगते थे. किसी से बात करने और डेट पर चलने के लिए कहने की हिम्मत जुटानी पड़ती थी.

अब तकनीक ने दुनिया को इतना तेज़ बना दिया है कि किसी ख़ास को ढूंढने में भी पल भर लगता है. आपके एक उंगली पर हां या ना निर्भर करता है.

देखने में तो ये साधारण से ऐप होते हैं. जो आपके मोबाइल में इंटरनेट की मदद से चल रहे हैं.

लेकिन ये ज़िंदगियों पर ख़ास असर डालते हैं, क्योंकि ये एक इंसान को उसकी पसंद के दूसरे इंसान से जोड़ने का काम करते हैं. जहां लोग एक दूसरे से फ्लर्ट करते हैं, बातचीत करते हैं और प्यार करने लगते हैं और कुछ शादी भी कर लेते हैं.

ये ऐप्स लोकेशन बेस्ड भी होते हैं, यानी वो आपके आस-पास ही आपके लिए साथी को ढूंढते हैं.

टिंडर भारत में ख़ासा लोकप्रिय डेटिंग ऐप है. इसके अलावा बंबल, हैप्पन, ट्रूली मैडली, ओके क्यूपिड, ग्राइंडर जैसे तमाम ऐप लोग आज़मा रहे हैं.

वैसे तो अधिकतर ऐप फ्री में इस्तेमाल किए जा सकते हैं, लेकिन ये पैसे देकर मैच की संभावनाओं को बढ़ाने का दावा भी करते हैं.

ये ऐप आपका मैच ढूढ़ने के लिए ना सिर्फ़ आपकी लोकेशन और उम्र को ध्यान में रखते हैं, बल्कि आपकी सेक्शुअल ओरिएंटेशन के हिसाब से लोगों को आपसे मिलवाते हैं.

24 साल की मीनाक्षी अलग-अलग शिफ्ट में काम करती हैं. काम के लिए काफ़ी ट्रेवल भी करती हैं.

वो कहती हैं कि उनके पास वक़्त ही नहीं है कि वो बाहर जाकर लोगों से मिलें.

उन्होंने टिंडर डाउनलोड किया, जहां उन्होंने कई सारे लड़कों की प्रोफ़ाइल देखी.

टिंडर में एक स्वाइपिंग टूल होता है. आपको कोई पसंद आए तो राइट स्वाइप कीजिए या अगर पसंद ना आए तो लेफ्ट स्वाइप कीजिए. अगर दोनों एक दूसरे को राइट स्वाइप करते हैं यानी दोनों पक्ष एक दूसरे को पंसद कर लें तो ये हुआ एक "मैच."

टिंडर के मुताबिक़ उनके ज़्यादातर यूज़र 18 से 30 साल की उम्र के बीच के होते हैं.

टिंडर की वेबसाइट का दावा है कि दुनियाभर में हर हफ्ते 10 लाख डेट्स इसके ज़रिए होती हैं. अब तक 30 अरब से ज़्यादा लोग इसके ज़रिए मैच हुए हैं, यानी उन्होंने एक-दूसरे को पसंद किया है. और 190 से ज़्यादा देशों में लोग इसका इस्तेमाल कर रहे हैं.

भारत में टिंडर की जनरल मैनेजर तरु कपूर ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि पढ़ाई और काम में व्यस्तता के चलते आज-कल के युवाओं का सर्कल बहुत छोटा हो गया है. उनके कुछ गिने-चुने दोस्त होते हैं. डेटिंग ऐप का चलन बढ़ने का कारण ही यही है कि लोग नए लोगों से मिलना चाहते हैं, अपनी पसंद के लोगों से मिलना चाहते हैं, जिनसे उनके विचार मिलते हों और पसंद मिलती हो.

मीनाक्षी ने कई और डेटिंग ऐप्स भी आज़माए. उनका कहना है कि वो इन डेटिंग ऐप्स के ज़रिए कुछ ऐसे लोगों से मिलीं, जिनसे शायद वो कभी नहीं मिलती, उनके रास्ते शायद कभी टकराते नहीं.

इसलिए उन्हें लगता है कि डेटिंग ऐप्स ने उनके लिए इस दायरे को बढ़ा दिया है.

तरु कपूर कहती हैं कि पहले लोग जहां पैदा हुए, स्कूल गए, वहीं सारी ज़िंदगी रहते हैं. लेकिन अब नई पीढ़ी, पढ़ाई और नौकरी के लिए अलग-अलग शहरों में जाती है. वहां वो अपना नया सर्कल बढ़ाना चाहते हैं. आज हर किसी के पास स्मार्टफोन है. लोग अपने इस पर्सनल डिवाइस के ज़रिए सब काम करने लगे हैं. आज का युवा अपनी ज़िंदगी पर कंट्रोल भी चाहता है और अपनी ज़िम्मेदारी भी लेता है.

उनका ये भी कहना है कि जैसे-जैसे औरतों की शिक्षा और फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस बढ़ती जा रही है. अब वो अपने करियर, फ़ैमिली, दोस्त-प्यार-शादी के बारे में ख़ुद फ़ैसले लेना चाहती हैं.

वहीं रिलेशनशीप एक्सपर्ट निशा खन्ना कहती हैं कि आजकल जब तक युवा अपना करियर सेट करते हैं वो 30-35 साल के हो जाते हैं. तब तक वो शादी नहीं करते और कमिटमेंट में नहीं जाना चाहते. लेकिन वो चाहते हैं कि कोई उनके साथ हो, जिसके साथ वो घूम सकें .

वो कहती हैं कि डेटिंग ऐप्स पर कई लोग ऐसा रिश्ते ढूंढते हैं, जो लॉन्ग टर्म ना हों. टिंडर और बंबल पर लोग सेक्शुएल रिलेशन के लिए जाते हैं. और ऐसे शार्ट टर्म रिलेशन के लिए जाते हैं जिसमें इमोशनल अटैचमेंट ना हो.

26 साल के रवि भी डेटिंग ऐप पर हैं. उनके मुताबिक़ वो सिर्फ़ हुकअप्स के लिए डेटिंग ऐप्स पर जाते हैं. यानी वो कोई सीरियस रिलेशन नहीं देख रहे होते हैं, उन्हें केजुअल सेक्स के लिए पार्टनर चाहिए होता है. उन्होंने कुछ लड़कियों के साथ वन नाइट स्टैंड भी किया है.

वहीं शिवानी कहती हैं कि जिन लड़कों से वो डेटिंग ऐप्स पर मिली उनसे अपनी सेक्शुएलिटी के बारे में खुल कर बात कर पाई. वो कहती हैं कि हो सकता है बाहरी दुनिया में उन्हें इसपर कोई जज करे, लेकिन डेटिंग ऐप्स पर लोग खुलकर अपनी सेक्शुएल डिज़ायर्स के बारे में एक-दूसरे से बात कर पाते हैं.

रिलेशनशीप एक्सपर्ट निशा खन्ना कहती हैं, "पहले रिश्तों में महिलाएं ज़्यादा कॉम्प्रोमाइज़ करती थीं. वो ज़्यादा एडजस्टमेंट करती थीं. लेकिन अब ज़माना बदल गया है. अब महिलाएं अपने अधिकारों को लेकर ज़्यादा सजग हैं. अब वो काम करने लगी हैं तो उनके पास ज़्यादा एक्पोज़र है पहले महिलाएं ज़्यादा डेटिंग ऐप इस्तेमाल नहीं करती थी, पुरुष ज़्यादा करते थे. लेकिन अब महिलाएं भी अपनी सेक्शुअल इच्छाओं के बारे में बात कर रही हैं, अपनी पसंद-नापसंद के बारे में बात कर रही हैं, ऑर्गेज़्म के बारे में बात कर रही हैं. कुछ महिलाएं शादी ना करके सिंगल रहना चाहती हैं, पहले लव मैरिज का कल्चर भी नहीं था."

हालांकि इन ऐप्स को इस्तेमाल करने वाले अधिकतर पुरुष हैं. 'वू' नाम के डेटिंग ऐप ने 2018 में एक अध्ययन किया था, जिसमें पाया गया था कि इन डेटिंग ऐप्स पर जेंडर गैप बहुत ज़्यादा है. स्टडी के मुताबिक़ भारत में डेटिंग ऐप इस्तेमाल करने वाले कुल लोगों में सिर्फ़ 26 प्रतिशत के क़रीब ही महिलाएं हैं. यानी कहने का मतलब ये है कि भारत में हर एक महिला के लिए यहां तीन पुरुष हैं.

लेकिन डेटिंग कंपनियों का मानना है कि महिलाओं की वजह से डेटिंग ऐप चल रहे हैं. इसलिए वो चाहते हैं कि ज़्यादा से ज़्यादा महिलाएं इन ऐप्स को इस्तेमाल करें.

तरु कपूर कहती हैं कि इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों में पुरुष 70 प्रतिशत हैं और महिलाएं सिर्फ़ 30 प्रतिशत. दूसरी बात आज की पीढ़ी ने शादी की उम्र को बढ़ा दिया है, लेकिन लड़कों के मुक़ाबले लड़कियों की शादी जल्दी हो जाती है. लिहाज़ा सिंगल पूल में लड़के ज़्यादा हैं, लड़कियां कम. हालांकि वो कहती हैं कि "लड़कियों को डेटिंग ऐप्स तक लाने और यहां उन्हें ज़्यादा कंफ़र्टेबल करने की हम पूरी कोशिश कर रहे हैं."

तरु के मुताबिक़ उन्होंने देखा है कि लड़किया लड़कों के मुक़ाबले टिंडर पर दोगुना वक़्त बिताती हैं. चाहे वो स्वाइप करने में हो या चैट करने में. तरु के मुताबिक़ औरते चाहती हैं कि उनकी ज़िंदगी में जो भी हो, उनपर उनका ज़्यादा कंट्रोल हो, लेकिन पितृसत्तातमक समाज की वजह से असल दुनिया में उनके पास वो कंट्रोल कम है.

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